हम और वो

कुछ दिनों पहले, यूरोप के दो शहरों को देखने का मौका मिला. सबसे पहले आप की जिस चीज़ पर नज़र पड़ती है वह है, सफाई. एयरपोर्ट साफ़ सुथरे ही नहीं, बल्कि चमचमाते दिखते हैं. बाहर आने पर वैसी ही सड़के दिखती है. कोई गड्ढा युक्त सड़क नहीं मिलेगी. उसके बाद जब आप टैक्सी में बैठ कर अपने गंतव्य की ओर प्रस्थान करतें है, तो जो दूसरी चीज़ आप का ध्यान आकर्षित करती है वह है, नियम का पालन. सड़क पर चलने वाले सभी लोग, जो भी नियम है उनका पूरा सम्मान करते दिखते हैं. पहले-पहले तो टैक्सी की गति देख कर मुझे डर लगा, कि कहीं कोई दुर्घटना न हो जाये. लेकिन धीरे से समझ में आया, की बीच में कोई दौड़ कर सड़क पार नहीं करेगा, या अचानक से कोई लेन नहीं बदलेगा, इसलिए आप थोड़ी तेज गति से गाड़ी दौड़ा सकते हैं. एक बात और दिखी, लोगों को बेवजह हॉर्न बजाने का कोई शौक नहीं है.

एक और बात जो ध्यान खींच गई, वह यह थी, कि हर गली, मोहल्ले, चौराहे, बाजारों और सड़कों पर उस देश के माननीयों, धर्मगुरुओ, संगीतज्ञों, लेखकों, कवियों, सेनापतियों, चित्रकारों और वीरों की प्रतिमायें लगी हैं, और उनसे सम्बंधित संग्रहालयों की भरमार हैं. सच ही हैं, कोई देश कितना भी विकसित हो जाये, लेकिन उसकी जड़े कहाँ से निकली हैं, कितने लोगों ने उस देश को वहाँ तक पहुंचाने के लिए कितने त्याग किये है, कितने बलिदान दिए है, यह कभी नहीं भूलता और न ही आने वाली संतानों को भूलने देता है. शहर बना ही ऐसा होता है, की आप की नज़र रोज ही उन लोगों पर जाती है जिनका देश को आगे बढ़ाने में योगदान है. आप बिना उनको देखे, अपने कार्यस्थल तक और फिर वापस घर नहीं पहुँच सकते. उनकी प्रतिमाओं के साथ, उनके द्वारा किये गए कार्यों का वर्णन और उनके द्वारा दिए गए प्रसिद्ध उद्धरण भी लिखे होते हैें, ताकि जिसको न पता हो, वह भी पढ़ कर जान सके.

अपनी जड़ों को हमेशा याद रखने के अलावा एक और बात है, जो ध्यान खींच गयी, यूरोप के दोनों शहरों में जो भी प्रतिमाएं लगाई थीं, गिरिजाघर बने थे या जो भी संग्रहालय हैं , वह बहुत विशाल हैं. चाहे मूर्तियां हो या भवन. यह प्रतिमाएं और भवन बहुत ही विशालकाय, वैभवशाली और भव्य होते है , उनके महापुरुषों के कार्यों की ही तरह. आप रोजमर्रा के कार्यों में वयस्त होते हुए भी, उन भीमकाय धरोहरों को देखते हुए ,जाने अनजाने अपने पुरखों के प्रति रोज ही कृतज्ञ होतें हैं. हम भारतीयों ने वह कृतज्ञता कहीं खो दी है. Hell !!! हम तो शायद ठीक से जानते भी नहीं, कि हमारे महापुरुष कौन हैं. जब मैं नयी दिल्ली एयरपोर्ट से घर वापस आ रही थी तो एक सैनिक भवन के सामने की प्रतिमा देख कर अवाक रह गयी, इतनी छोटी और इतनी पिद्दी? हमारे सैनिकों की शूरवीरता और उस प्रतिमा में कोई तारतम्य नहीं था. मैंने कैप्टन विजयंत थापर मार्ग तो देखा है, पर उनकी कोई प्रतिमा नहीं देखी। ये किस तरह की कृतज्ञता है? यह कौन सा आभार व्यक्त करने का तरीका है?

उन शहरों में, मैंने यह भी देखा जब वह वह देश पद-दलित हुए थे, युद्ध के मैदान में हार मिली थी और किसी और का कब्ज़ा हो गया था, उन्होंने उन सभी धरोहरों को भी उतना ही सहेज़ कर रखा है, ताकि आने वाली संताने उनसे सबक ले सके और इतिहास दोहराया न जा सके. किस होटल में विदेशी आक्रांता आ कर ठहरते थे और देश के खिलाफ षड़यंत्र रचते थे, उसको भी बताया और दिखाया जाता है. कहाँ-कहाँ पर यंत्रणाघर बने थे, कहाँ पर राजनितिक कैदियों को असहनीय यातनाए दी जाती थी, कहाँ पर गोलियों से लोग और मकान दोनों छलनी हो गए थे, उन गोलियों के निशान तक को सुरक्षित रखा हुआ है, ताकि आज की पीढ़ी जो जीवनशैली जी पा रही है, वह ऐसे ही हास -परिहास का परिणाम नहीं है. उसके लिए, उनके पूर्वजों का त्याग, बलिदान और तप शामिल हैं. अपने पूर्वजों की गलत निर्णयों की धरोहरों को भी सुरक्षित रखने में उनको कोई लज़्जा या अपमान नहीं महसूस होता, बल्कि यह आने वाली और वर्तमान, दोनों ही संततियों को सावधान करने का कार्य करती है.

एक बुद्धिजीवी और परिपक्व शाषन तंत्र ऐसे ही काम करता हैं. वह इतिहास की शौर्य गाथाओं और त्रुटियों दोनों को ही अपने जनता के दिमाग से कभी भी उतरने नहीं देता. वह ऐसे स्मारक चिह्नों का निर्माण करता है, कि आप चाहें या न चाहें आप को रोज ही उनसे दो-चार होना ही पड़ेगा. नहीं तो एक जड़हीन, गतिहीन, तमाशा देखने वाले निष्क्रिय और आवारा समाज के निर्माण से आप को कोई रोक नहीं सकता. जिसको पतन, पद -दलित और पिटने के लिए किसी कारण की आवश्यकता नहीं होगी. छद्मवेशी (pseudo) पत्रकार, छद्मवेशी बुद्दिजीवी , राजनेता, डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक, छद्मवेशी समाजसेवी, छद्मवेशी सोशल एक्टिविस्ट, बैंककर्मी और प्रशानिक पदों पर बैठे लोग इस काम को आप के लिए तत्परता से कर देंगे।

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